भारत का संविधान नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता देता है और व्यक्तिगत कानून (Personal Laws) इसी आधार पर अलग-अलग समुदायों के सामाजिक एवं पारिवारिक मामलों को नियंत्रित करते हैं। लेकिन जब मामला नाबालिग लड़की की शादी से जुड़ा हो तो अक्सर व्यक्तिगत कानून (Personal Law) और बाल विवाह निषेध कानून (Prohibition of Child Marriage Act – PCMA, 2006) के बीच टकराव देखने को मिलता है।
- मामला क्या है? (Case Background)
- NCPCR की आपत्ति (NCPCR’s Objection)
- सुप्रीम कोर्ट का फैसला (Supreme Court’s Judgment)
- कानूनी टकराव: पर्सनल लॉ बनाम बाल विवाह निषेध अधिनियम
- मुस्लिम पर्सनल लॉ में विवाह की उम्र
- सामाजिक और कानूनी बहस
- बाल विवाह निषेध अधिनियम (PCMA) की भूमिका
- भारत में बाल विवाह की स्थिति
- सरकार और समाज के सामने चुनौती
- 1. सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया?
- 2. क्या यह बाल विवाह निषेध अधिनियम का उल्लंघन नहीं है?
- 3. क्या यह फैसला सभी धर्मों पर लागू होगा?
- 4. इस फैसले के क्या परिणाम हो सकते हैं?
- 5. क्या भारत में बाल विवाह पूरी तरह खत्म हो चुका है?
- निष्कर्ष
हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) ने एक अहम आदेश सुनाते हुए राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत नाबालिग मुस्लिम लड़की की शादी मान्य है, यदि वह शारीरिक और मानसिक रूप से परिपक्व है।
यह फैसला न सिर्फ कानूनी जगत में बहस का विषय बना बल्कि इससे सामाजिक और धार्मिक स्तर पर भी कई सवाल खड़े हुए हैं।
मामला क्या है? (Case Background)
मामला एक नाबालिग मुस्लिम लड़की की शादी से जुड़ा है।
लड़की की उम्र 16-17 वर्ष बताई गई।
उसने अपनी मर्जी से शादी करने का दावा किया।
परिवार और कुछ अन्य पक्षों ने इस शादी पर आपत्ति जताई और इसे बाल विवाह निषेध कानून का उल्लंघन बताया।
मामला जब पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में पहुँचा तो कोर्ट ने यह कहते हुए शादी को वैध माना कि:
मुस्लिम पर्सनल लॉ (Shariat) के अनुसार, लड़की 15 साल की उम्र पूरी होने के बाद शादी कर सकती है, यदि वह शारीरिक और मानसिक रूप से परिपक्व हो।
लड़की ने अपनी इच्छा से शादी की थी और उस पर दबाव का कोई सबूत नहीं था।
NCPCR की आपत्ति (NCPCR’s Objection)
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने हाईकोर्ट के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
उनका तर्क था:
यह आदेश बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 (PCMA) का उल्लंघन है।
18 वर्ष से कम उम्र की लड़की की शादी गैरकानूनी और अवैध है।
पर्सनल लॉ को बाल संरक्षण कानूनों से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला (Supreme Court’s Judgment)
सुप्रीम कोर्ट ने NCPCR की याचिका को खारिज करते हुए हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार, लड़की 15 साल की उम्र पूरी होने पर शादी करने के योग्य है।
इस मामले में लड़की ने अपनी मर्जी से शादी की थी और उसकी सहमति दर्ज की गई।
चूंकि यह मामला धार्मिक पर्सनल लॉ से संबंधित है, इसलिए इसे उसी दृष्टिकोण से देखा जाएगा।
कानूनी टकराव: पर्सनल लॉ बनाम बाल विवाह निषेध अधिनियम
भारत में विवाह संबंधी दो प्रमुख कानूनी ढांचे हैं:
व्यक्तिगत कानून (Personal Laws) – जैसे कि हिंदू विवाह अधिनियम, मुस्लिम पर्सनल लॉ, ईसाई विवाह अधिनियम इत्यादि।
बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 (PCMA) – यह सार्वभौमिक कानून है जो किसी भी लड़की की 18 वर्ष से पहले और लड़के की 21 वर्ष से पहले शादी को अवैध मानता है।
विवाद यह है कि:
क्या पर्सनल लॉ सार्वभौमिक कानूनों से ऊपर हैं?
क्या धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर बाल विवाह को वैध ठहराया जा सकता है?
मुस्लिम पर्सनल लॉ में विवाह की उम्र
मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत, लड़की 15 वर्ष की होने के बाद शादी कर सकती है।
इसे “एज ऑफ प्यूबर्टी” (Age of Puberty) माना जाता है।
यदि लड़की 15 वर्ष से ऊपर है और अपनी इच्छा से शादी करती है तो वह शादी वैध मानी जाती है।
सामाजिक और कानूनी बहस
इस फैसले के बाद समाज में कई तरह की बहस छिड़ गई:
फैसले के समर्थन में तर्क
यह धार्मिक स्वतंत्रता (Right to Religion) का हिस्सा है।
अगर लड़की अपनी इच्छा से शादी करती है तो यह उसका अधिकार है।
पर्सनल लॉ को संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मान्यता प्राप्त है।
फैसले के खिलाफ तर्क
यह फैसला बाल विवाह की प्रथा को बढ़ावा देगा।
18 वर्ष से कम उम्र की लड़की मानसिक और भावनात्मक रूप से शादी के लिए तैयार नहीं होती।
यह महिला सशक्तिकरण और बाल अधिकारों के खिलाफ है।
बाल विवाह निषेध अधिनियम (PCMA) की भूमिका
PCMA के तहत, लड़की की शादी की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष तय है।
नाबालिग की शादी को अदालत में चुनौती देकर निरस्त (Annul) कराया जा सकता है।
लेकिन, कोर्ट के इस फैसले के बाद PCMA और मुस्लिम पर्सनल लॉ में टकराव और गहरा हो गया है।
भारत में बाल विवाह की स्थिति
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5, 2019-21) के अनुसार, भारत में लगभग 23% लड़कियों की शादी 18 वर्ष से पहले हो जाती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में यह दर और अधिक है।
बाल विवाह से जुड़े खतरे:
मातृ मृत्यु दर (Maternal Mortality Rate) बढ़ना।
बालिकाओं की शिक्षा रुकना।
घरेलू हिंसा और आर्थिक निर्भरता।
सरकार और समाज के सामने चुनौती
यह फैसला एक बड़ी चुनौती खड़ी करता है:
क्या पर्सनल लॉ को सार्वभौमिक कानूनों के ऊपर रखा जाए?
क्या महिला और बाल अधिकारों की सुरक्षा के लिए कानूनों में सुधार की आवश्यकता है?
कैसे धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक सुरक्षा के बीच संतुलन बनाया जाए?
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया?
सुप्रीम कोर्ट ने NCPCR की याचिका खारिज करते हुए कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत नाबालिग मुस्लिम लड़की की शादी वैध है यदि वह 15 साल से अधिक उम्र की है और सहमति देती है।
2. क्या यह बाल विवाह निषेध अधिनियम का उल्लंघन नहीं है?
यहां विवाद यही है। PCMA 18 साल से पहले की शादी को अवैध मानता है, जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ 15 साल की उम्र को वैध मानता है।
3. क्या यह फैसला सभी धर्मों पर लागू होगा?
नहीं, यह सिर्फ मुस्लिम पर्सनल लॉ के मामलों में लागू होगा।
4. इस फैसले के क्या परिणाम हो सकते हैं?
बाल विवाह की प्रथा को बढ़ावा मिल सकता है।
धार्मिक स्वतंत्रता और महिला अधिकारों के बीच टकराव गहराएगा।
भविष्य में बड़े संवैधानिक बेंच के सामने यह मुद्दा फिर उठ सकता है।
5. क्या भारत में बाल विवाह पूरी तरह खत्म हो चुका है?
नहीं, अभी भी ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में यह प्रथा जारी है। NFHS-5 के अनुसार, हर चार में से एक लड़की की शादी 18 साल से पहले हो रही है।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारतीय न्यायपालिका, समाज और सरकार के सामने एक गहरा प्रश्न खड़ा करता है।
क्या धार्मिक स्वतंत्रता (Right to Religion) व्यक्तिगत कानूनों को सार्वभौमिक कानूनों से ऊपर रख सकती है?
क्या 18 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों की शादी को वैध ठहराना महिला सशक्तिकरण और बच्चों के अधिकारों के खिलाफ नहीं है?
यह मामला निश्चित रूप से आने वाले समय में संसद और संवैधानिक पीठ में गहन बहस का विषय बनेगा।