मैसूरु: गन्ना किसानों ने प्रति टन ₹4,500 का समर्थन मूल्य मांगा

TARESH SINGH
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कर्नाटक के मैसूरु (Mysuru) जिले में गन्ना किसानों ने हाल ही में राज्य सरकार और चीनी मिल मालिकों से प्रति टन ₹4,500 का मूल्य तय करने की मांग की है। किसानों का कहना है कि लगातार बढ़ती उत्पादन लागत, खाद-बीज की महंगाई और श्रमिकों के खर्च के चलते उन्हें वर्तमान समर्थन मूल्य (FRP/MSP) से कोई लाभ नहीं हो रहा है। यदि उचित मूल्य नहीं दिया गया तो उनका कृषि व्यवसाय घाटे में चला जाएगा।

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किसानों की मांग क्यों है जायज़?

बढ़ती उत्पादन लागत

  • खाद और कीटनाशकों की कीमतों में तेजी से वृद्धि।

  • डीज़ल और बिजली की दरें बढ़ने से सिंचाई महंगी हो गई है।

  • श्रमिकों की मजदूरी लगातार बढ़ रही है।

बाजार में असंतुलन

  • चीनी मिलें अक्सर समय पर किसानों को भुगतान नहीं करतीं।

  • खुले बाजार में बिचौलिए किसानों से कम दाम पर गन्ना खरीद लेते हैं।

घरेलू जरूरतें

  • खेती से होने वाली आमदनी अब परिवार की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए भी पर्याप्त नहीं है।


वर्तमान समर्थन मूल्य बनाम किसानों की मांग

श्रेणीमौजूदा समर्थन मूल्य (प्रति टन)किसानों की मांग (प्रति टन)
FRP (केंद्र द्वारा तय)₹3,150 – ₹3,200₹4,500
राज्य सरकार द्वारा घोषित (SAP)₹3,500 – ₹3,700 (कुछ राज्यों में)₹4,500
बाजार दर (औसत)₹3,000 – ₹3,200₹4,500

स्पष्ट है कि किसानों की मांग और मौजूदा मूल्य में लगभग ₹1,300 – ₹1,500 का अंतर है।


मैसूरु और कर्नाटक में गन्ना उत्पादन

  • कर्नाटक देश का दूसरा सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक राज्य है।

  • मैसूरु, मंड्या, बेलगावी और बागलकोट गन्ना उत्पादन के प्रमुख क्षेत्र हैं।

  • यहाँ की कई चीनी मिलें सीधे स्थानीय किसानों से गन्ना खरीदती हैं।


किसान संगठनों का आंदोलन

  • किसान संगठनों ने सरकार से तत्काल मूल्य वृद्धि की मांग की है।

  • कई स्थानों पर किसानों ने धरना और प्रदर्शन शुरू किए हैं।

  • अगर जल्द फैसला नहीं हुआ तो किसान मिलों को गन्ना सप्लाई रोकने की चेतावनी भी दे रहे हैं।


सरकार और चीनी मिल मालिकों की स्थिति

  • सरकार का तर्क है कि वैश्विक बाजार में चीनी की कीमतें स्थिर नहीं हैं।

  • मिल मालिकों का कहना है कि यदि ₹4,500 का रेट तय किया गया तो उन्हें भारी घाटा होगा।

  • लेकिन किसान कहते हैं कि कृषि घाटे में होने पर वे खेती करना ही बंद कर देंगे, जिससे चीनी उद्योग खुद प्रभावित होगा।


अंतरराष्ट्रीय संदर्भ

  • ब्राज़ील, थाईलैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में किसानों को गन्ने के अच्छे दाम मिलते हैं।

  • भारत में गन्ने की कीमत कम होने के बावजूद चीनी की एक्सपोर्ट कीमतें ऊँची रखी जाती हैं।

  • किसानों का तर्क है कि जब सरकार चीनी निर्यात से मुनाफा कमा रही है तो उन्हें भी उचित दाम देना चाहिए।


किसानों की आर्थिक चुनौतियाँ

  • कर्ज़ का बोझ: कई किसान सहकारी बैंकों और साहूकारों से कर्ज़ लेकर खेती कर रहे हैं।

  • परिवार की शिक्षा और स्वास्थ्य पर असर: पर्याप्त आय न होने से बच्चों की पढ़ाई और घर का इलाज प्रभावित होता है।

  • आत्महत्या का खतरा: दक्षिण भारत में गन्ना किसानों की आत्महत्या की खबरें अक्सर सामने आती हैं।


समाधान क्या हो सकता है?

  1. न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में तत्काल वृद्धि
    किसानों को ₹4,500 प्रति टन देने पर विचार किया जाना चाहिए।

  2. भुगतान समय पर हो
    मिल मालिकों को 14 दिनों के भीतर गन्ने का भुगतान करने के लिए बाध्य किया जाए।

  3. उत्पादन लागत आधारित मूल्य निर्धारण
    स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू की जाएं।

  4. सरकारी सब्सिडी
    बिजली, डीज़ल और खाद पर किसानों को राहत दी जाए।

  5. चीनी उद्योग सुधार
    मिल मालिकों और किसानों के बीच पारदर्शी समझौता हो।

 


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. किसान गन्ने का ₹4,500 प्रति टन मूल्य क्यों मांग रहे हैं?

क्योंकि वर्तमान समर्थन मूल्य उनकी उत्पादन लागत को पूरा नहीं करता और उन्हें घाटा हो रहा है।

2. वर्तमान में गन्ने का समर्थन मूल्य कितना है?

केंद्र सरकार का FRP लगभग ₹3,150 – ₹3,200 प्रति टन है, जबकि किसान ₹4,500 की मांग कर रहे हैं।

3. क्या सरकार किसानों की मांग मान सकती है?

संभव है कि राज्य सरकार SAP (State Advised Price) बढ़ा दे, लेकिन अंतिम फैसला वार्ता के बाद होगा।

4. यदि किसानों को उचित मूल्य नहीं मिला तो क्या होगा?

किसान गन्ना सप्लाई रोक सकते हैं, आंदोलन तेज़ कर सकते हैं और इससे चीनी उद्योग प्रभावित हो सकता है।

5. गन्ना किसानों की स्थिति सुधारने के लिए क्या उपाय हो सकते हैं?

MSP में बढ़ोतरी, समय पर भुगतान, सब्सिडी और पारदर्शी मूल्य निर्धारण प्रणाली।


निष्कर्ष

मैसूरु और कर्नाटक के गन्ना किसानों की ₹4,500 प्रति टन समर्थन मूल्य की मांग केवल आर्थिक आवश्यकता ही नहीं बल्कि उनके जीवनयापन और भविष्य का सवाल है। सरकार और चीनी उद्योग को इस पर संवेदनशील होकर निर्णय लेना होगा।
अगर किसानों को उचित दाम नहीं मिला, तो न केवल कृषि संकट और गहराएगा बल्कि देश की चीनी आपूर्ति भी खतरे में पड़ जाएगी।

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