भारत का क्लाइमेट टैक्सोनॉमी फ्रेमवर्क: इसे प्रभावी बनाने के उपाय

TARESH SINGH
6 Min Read

भारत जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित देशों में से एक है। तेज़ी से बढ़ते तापमान, बेमौसम वर्षा, ग्लेशियरों का पिघलना, समुद्र-स्तर में वृद्धि और बार-बार आने वाली आपदाएँ इसकी गंभीरता को दर्शाती हैं। ऐसे में भारत के लिए यह ज़रूरी है कि वह हरित निवेश (Green Investment) और सतत विकास (Sustainable Development) को संस्थागत ढांचे में शामिल करे।

यही कारण है कि भारत ने क्लाइमेट टैक्सोनॉमी फ्रेमवर्क (Climate Taxonomy Framework) बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया है। यह फ्रेमवर्क निवेश, वित्त और विकास परियोजनाओं को “ग्रीन” या “सस्टेनेबल” मानकों के अनुसार वर्गीकृत करेगा।


क्लाइमेट टैक्सोनॉमी फ्रेमवर्क क्या है?

सरल शब्दों में, टैक्सोनॉमी का अर्थ है—किसी चीज़ को श्रेणियों में बाँटना।

  • क्लाइमेट टैक्सोनॉमी फ्रेमवर्क का मतलब है ऐसा ढांचा, जिसमें यह तय किया जाए कि कौन-सा निवेश पर्यावरण के अनुकूल है और कौन-सा नहीं।

  • उदाहरण के लिए—सोलर एनर्जी, विंड एनर्जी, इलेक्ट्रिक वाहन चार्जिंग स्टेशन आदि को “ग्रीन निवेश” की श्रेणी में रखा जा सकता है, जबकि कोयला आधारित पावर प्लांट्स को “नॉन-ग्रीन” या “ट्रांज़िशन” कैटेगरी में रखा जाएगा।


भारत को क्लाइमेट टैक्सोनॉमी की ज़रूरत क्यों?

  1. ग्रीन फाइनेंस की दिशा में स्पष्टता
    – बैंकों, वित्तीय संस्थानों और निवेशकों को यह पता चले कि कौन-सा प्रोजेक्ट सचमुच हरित है।
    – इससे “ग्रीनवॉशिंग” (झूठा ग्रीन दावा) कम होगा।

  2. अंतरराष्ट्रीय निवेश आकर्षित करने के लिए
    – यूरोपीय संघ (EU) और कई अन्य देशों ने पहले ही ग्रीन टैक्सोनॉमी लागू कर दी है।
    – यदि भारत भी स्पष्ट मानक तय करेगा तो विदेशी निवेशक अधिक भरोसे के साथ भारत में ग्रीन प्रोजेक्ट्स में पैसा लगाएंगे।

  3. नेट ज़ीरो लक्ष्य हासिल करने के लिए
    – भारत ने 2070 तक नेट ज़ीरो उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है।
    – टैक्सोनॉमी यह सुनिश्चित करेगी कि वित्त उसी दिशा में प्रवाहित हो।

  4. वैश्विक प्रतिस्पर्धा और निर्यात पर असर
    – कई देशों ने कार्बन बॉर्डर टैक्स लगाने की तैयारी कर ली है।
    – यदि भारत अपने उद्योगों और निर्यात को हरित मानकों से नहीं जोड़ेगा, तो वैश्विक व्यापार में नुकसान हो सकता है।


मौजूदा चुनौतियाँ

  1. स्पष्ट परिभाषा की कमी
    – कौन-सी गतिविधि ग्रीन है और कौन-सी नहीं, यह तय करना कठिन है।
    – उदाहरण: गैस आधारित बिजली उत्पादन को ट्रांज़िशनल माना जाए या नहीं?

  2. डेटा और मॉनिटरिंग की कमी
    – भारत में कई प्रोजेक्ट्स के पास सटीक कार्बन फुटप्रिंट या उत्सर्जन का डेटा उपलब्ध नहीं है।

  3. वित्तीय संस्थानों की तैयारी
    – बैंक और NBFCs के पास अभी पर्याप्त विशेषज्ञता नहीं है कि वे प्रोजेक्ट्स का पर्यावरणीय मूल्यांकन कर सकें।

  4. राज्यों के बीच असमानता
    – कुछ राज्य नवीकरणीय ऊर्जा में आगे हैं (जैसे गुजरात, राजस्थान), जबकि कुछ राज्य अब भी कोयले पर निर्भर हैं।


अंतरराष्ट्रीय उदाहरण

  1. यूरोपीय संघ (EU Taxonomy)
    – यह दुनिया का सबसे व्यापक ग्रीन टैक्सोनॉमी फ्रेमवर्क है।
    – इसमें 6 पर्यावरणीय उद्देश्यों को आधार बनाया गया है:

    1. जलवायु परिवर्तन शमन

    2. जलवायु परिवर्तन अनुकूलन

    3. जल संसाधन की सुरक्षा

    4. प्रदूषण की रोकथाम

    5. परिपत्र अर्थव्यवस्था

    6. जैव विविधता की सुरक्षा

  2. चीन की ग्रीन बॉन्ड एंडोर्स्ड प्रोजेक्ट कैटेगरीज
    – चीन ने बांड बाज़ार के ज़रिए ग्रीन निवेश को परिभाषित किया।
    – चीन ने शुरुआत में “क्लीन कोल” को भी ग्रीन माना था, लेकिन वैश्विक दबाव के बाद इसे हटा दिया।

  3. दक्षिण अफ्रीका और इंडोनेशिया
    – ये देश भी अपनी टैक्सोनॉमी पर काम कर रहे हैं ताकि विदेशी निवेश आकर्षित किया जा सके।


भारत का रोडमैप

  1. स्पष्ट मानदंड तय करना
    – कौन-सी गतिविधियाँ ग्रीन होंगी, कौन-सी ट्रांज़िशनल और कौन-सी एक्सक्लूडेड (बाहर रखी गई)।

  2. नियमित अपडेट और पारदर्शिता
    – टैक्सोनॉमी स्थायी नहीं हो सकती। तकनीक बदलने के साथ इसे अपडेट करना ज़रूरी होगा।

  3. सभी हितधारकों की भागीदारी
    – सरकार, RBI, SEBI, बैंक, उद्योग, स्टार्टअप और सिविल सोसाइटी—सभी को इसमें शामिल करना होगा।

  4. डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर
    – उत्सर्जन, ऊर्जा खपत और पर्यावरणीय प्रभाव से जुड़ा डेटा सटीक और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराना होगा।

  5. राज्य सरकारों की भूमिका
    – राज्य-विशेष गाइडलाइन्स भी ज़रूरी होंगी क्योंकि हर राज्य की ऊर्जा संरचना अलग है।

  6. वैश्विक तालमेल
    – भारत को EU, चीन और अन्य देशों की टैक्सोनॉमी के साथ अपने फ्रेमवर्क को संरेखित करना होगा।


संभावित लाभ

  1. हरित निवेश में वृद्धि
    – विदेशी निवेशक भारत में ग्रीन बांड्स और प्रोजेक्ट्स में अधिक पैसा लगाएंगे।

  2. उद्योग और निर्यात को बढ़ावा
    – हरित मानकों के अनुरूप उद्योग बनने से भारत के उत्पाद वैश्विक बाज़ार में प्रतिस्पर्धी रहेंगे।

  3. रोज़गार के नए अवसर
    – नवीकरणीय ऊर्जा, EVs, ऊर्जा दक्षता और रिसाइक्लिंग जैसे क्षेत्रों में लाखों नए रोजगार सृजित होंगे।

  4. पर्यावरणीय लाभ
    – प्रदूषण घटेगा, ऊर्जा खपत में दक्षता आएगी और जलवायु परिवर्तन से लड़ने में भारत मज़बूत बनेगा।


निष्कर्ष

भारत के लिए क्लाइमेट टैक्सोनॉमी फ्रेमवर्क केवल एक नियामक ढांचा नहीं है, बल्कि यह आर्थिक विकास, अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा और पर्यावरणीय सुरक्षा का आधार है। इसे प्रभावी बनाने के लिए स्पष्ट परिभाषा, डेटा पारदर्शिता, हितधारकों की भागीदारी और वैश्विक मानकों से तालमेल बेहद आवश्यक है।

यदि भारत इसे सही ढंग से लागू कर लेता है तो न सिर्फ़ वह अपने नेट ज़ीरो 2070 लक्ष्य की ओर मज़बूती से बढ़ेगा, बल्कि ग्रीन फाइनेंस का वैश्विक हब भी बन सकता है।

 

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